सात अक्तूबर को जब फ्रैंकफुर्ट हवाई अड्डे से फ्रेइबुर्ग जाने के लिए बाहर आया तो चारों ओर से रंगों ने घेर लिया। ये अपरिचित से लगते सम्मोहक रंग थे। यहाँ मैं रंगों के किसी मेले या महानगर में पहुँच गया था। यह हेमंत का मौसम था। पेड़ों से पत्ते जब आने वाले शरद के पहले पकने लगते हैं तो उनके भीतर साल भर तक छुपे हुए अनेक अदेखे रंग बाहर फूट पड़ते हैं। हम भी शायद जब धीरे-धीरे अपनी उम्र में पकते हैं, तो हमारे भीतर भी अब तक अदृश्य रहते आए बहुत सारे रंग बाहर आने लगते हैं। वे एक एक कर हमारी देह से अलग छूटते जाते हैं।
ये पत्ते भी उसी तरह धीरे धीरे पक कर पेड़ों से , उनकी टहनियों-दालों से झड़ते हैं और सड़क पर बिखरे हुए कोई एक उदास-सा दिन बनाते हैं। एक ही पेड़ की पत्तियों में रंगों की अलग-अलग कौंध होती है। अलग -अलग शेड्स। लेकिन हेमंत का पीला, पीला नहीं होता। न हरा, हरा होता है। धूसर, कत्थई, लाल, जामुनी सभी रंगों के साथ यही बात लागू होती है। कोई भी अपने जैसे परिचित रूप में नहीं होता. बाद में मैंने नेट में खोजा, लोगों से पूछा, तो पता चला कि इन रंगों के लिए थिसारस या शब्दकोशों में अलग जगह है. ये 'आटम कलर्स' (हेमंत के रंग) के बिल्कुल अलग नाम से जाने जाते हैं। मैंने एक दिन कई घंटे लग कर इन रंगों की पूरी सूची तैयार की।
उस रोज़ फ्रेइबुर्ग में चारों ओर फैले पेड़ों में जिन रंगों को मेरी ऑंखें देख रही थीं और जिन्होंने मुझे बाँध रखा था, उनमें से किसी भी रंग को उनके मूल नाम से नहीं बुलाया जा सकता था। बाज़ार में बिकने वाले किसी भी कलर बाक्स में ये रंग नहीं मिलते। इन्हें प्रकृति अपने अद्वितीय और नितांत मौलिक नैसर्गिक कल्पनाशीलता से समय के द्रव में घोल कर तैयार करती है। इनकी कैनवास में अनुकृति बहुत कठिन चुनौती है। इन्हें ठीक उस तरह से कैनवास पर उतारना, जिस तरह आँखें देखती हैं, उतना आसान नहीं है। समझ में अब आता है की क्लाद मोने या वान गाग के स्टिल लाइफ या सैरा संसार भर के कलाविदों द्वारा महान और अपूर्व क्यों माने गए। क्यों कि उनके चित्रों में जो रंग थे, वे बहुत हद तक इन अनोखे नैसर्गिक रंगों के बहुत निकट थे। उनमें इनकी कोई न कोई झलक या कौंध ज़रूर थी। उनकी महानता इसी तथ्य में अन्तर्निहित थी कि वे इन रंगों को प्रकृति से छीन कर, उन्हें उनके समय से अलग कर के, हमेशा के लिए कैनवास के हवाले कर देते थे। जिन्हें कोई कभी भी, हेमंत न हो तब भी, कोई वृक्ष या भूदृश्य न हो तब भी, अपने कमरे की दीवार पर, अपनी इच्छा से देख सकता था। विज्ञान , जिसने प्रकृति का विनाश किया, उससे कत्तई अलग यह कला की प्रकृति पर जीत का प्रमाण है। कलाओं में, अगर वे सच्ची कलाएं हैं तो, उनमें अद्भुत अनश्वर अहिंसा होती हैं। कला के हाथों न किसी चिड़िया का कोई घोसला उजड़ता है, न कोई नदी सूखती है, न पेड़ मरते हैं। कला तो प्रकृति से पकृति की सुन्दरता छीन कर उस सौंदर्य को अमर बनाती है। सुन्दरता को काल की कैद से रिहा करती है। वह सौन्दर्य को उसकी क्षणभंगुरता से मुक्त करती है। अपनी जिस सुन्दरता को प्रकृति ख़ुद काल के हाथों से बचा कर संरक्षित नहीं कर पाती, कलाएं उसे बचाती हैं।
इसीलिये अर्न्स्ट फिशर ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'कला की ज़रूरत' में कहा था कि 'कला वस्तुओं, क्षणों और अनुभवों को 'अमरता' (immortality) देती है। '
तो ७ अक्तूबर को मैं फ्रेइबुर्ग में, हवाई अड्डे के बाहर इस तरह रंगों के महानगर या महाकुम्भ में पहुँच गया था। मेरा बेटा सिद्धार्थ वहाँ मेरे इंतज़ार में खडा था। उसने पर्यावरण विज्ञान में ही स्नाकतोत्तर और शोध किया है और अब वहीं एक 'एको-इंस्टिट्यूट' में काम करता है। उसने बताया, जिसे बाद में बहुत से जर्मनी के दोस्तों ने पुष्ट किया कि फ्रेइबुर्ग को जर्मनी का 'एको-कैपिटल' (पर्यावरण की राजधानी) कहा जाता है। दुनिया भर में प्रसिद्ध 'ब्लैक फारेस्ट' यहाँ से बिल्कुल करीब है। संसार के बहुत घने जंगलों में से एक। वनस्पतियों का समुद्र। 'The great botanical reservoir' । काठ से बनने वाली यहाँ बहुत सी चीज़ें मिलती हैं। सबसे प्रसिद्ध है 'ब्लैक फारेस्ट' नाम की कंपनी द्वारा बनाई गयी वह दीवाल घड़ी, जो बिना चाभी भरे, बिना किसी बैटरी या बिजली के चलती है। इसे पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण चलाता है। इसका सबसे रोचक पहलू यह है कि हर आधे घंटे और एक घंटे पर घड़ी में ऊपर की ओर एक नन्ही-सी खिड़की की फटकी खुलती है और उसमें से एक चिड़िया सर निकाल कर, जितने बजते हैं , उतनी मरतबा कूकती है- 'कुक....... कुक ...... कुक ..... '।
मेरे वैशाली के घर की दीवार पर भी यही घड़ी टंगी हुई है। पिछले कई वर्षों से।
काठ की वह नन्हीं सी चिड़िया, धरती के गुरुत्व से बीच बीच में चौंक कर मुझे घंटे-पहर का हिसाब बताती रहती है। अभी जब मै यह आपके लिए टाइप कर रहा हूँ, लगभग ७ मिनट बाद वह चिड़िया ग्यारह बार बोलेगी और मै रसोई में जा कर दोपहर के खाने की तैयारी करूंगा।
जर्मनी की यह यात्रा मेरी निजी यात्रा नहीं थी। मैं वहाँ, फ्रैन्क्फुर्ट में आयोजित होने वाले विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मेले में भाग लेने गया हुआ था। तीन वर्ष पहले भी मैं इस पुस्तक मेले में आया था लेकिन तब मै नॅशनल बुक ट्रस्ट के सरकारी प्रतिनिधिमंडल का सदस्य था। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के अनेक लेखक उस मेले में आए थे। तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह भी। उस साल भारत इस पुस्तक मेले का मानद अतिथि देश था। इस बार हमारा पड़ोसी देश चीन सम्मानित अतिथि देश था और वहाँ के सरकारी प्रतिनिधिमंडल के लेखक भारी संख्या में वहाँ उसी तरह पहुंचे थे।
लेकिन अपने देश से इस बार मैं अकेला था और मुझे एक लेखक की तरह ही इसमें भाग लेना था। संयोजन समिति की तरफ़ से औपचारिक निमंत्रण १४ अक्टूबर से लेकर २५ अक्टूबर तक के लिए ही था लेकिन देखते ही देखते वहाँ से इतने निमंत्रण आ गए कि लगभग पूरा नवंबर बीतने की नौबत आ गयी। इक्कीस कार्यक्रम, अलग शहरों में अलग अलग तारीखों में। हर दूसरे दिन एक नये शहर की यात्रा। मै डरा हुआ था। जितना स्वचालित देश जर्मनी है, उतना शायद ही कोई दूसरा देश होगा। रेल गाड़ियां अपने नाम से नहीं, समय के नाम पर चलती हैं। एक-एक मिनट की पाबन्द। अगर आप ११ बज कर ५५ मिनट पर कोई ट्रेन लेंगे तो वह ख़ास गंतव्य की ओर ही जायेगी। जिस स्टेशन पर आपको उतरना है उसका नाम ज़रूरी नहीं, आप अपनी ट्रेन का 'अराइवल टाइम' देखिये। ठीक उसी समय आपकी गाडी वहाँ पहुंचेगी जहाँ आपको उतरना है। खैर, ये तो बाद की बातें हैं।
फ्रेइबुर्ग पहुँच कर मेरे भीतर सबसे अधिक उत्सुकता अपने पोते मारियुस को देखने की थी. पिछले साल नवम्बर में उसने मुझे 'बाबा' बना डाला था। मेरे परिवार में दादा को 'बाबा' और दादी को 'बुआ' कहने की परम्परा है। इस नवम्बर में ३ तारीख को वह एक साल का हो जाने वाला था। मैंने इसीलिए अपने जर्मनी के मित्रों से कहा था कि वे कुछ ऐसा शिड्यूल बनाएं कि ३ नवम्बर को मैं, मारियुस की पहली वर्षगाँठ पर वापस फ्रेइबुर्ग ज़रूर पहुंचू। ...मेरे प्रकाशक और भारतीय साहित्य तथा संस्कृति से पूरी संवेदना और गहराई से जुड़े क्रिश्चियन वाइस ने बिल्कुल वैसा ही किया था। उन्होंने ऐसा कार्यक्रम बनाया था कि मै उन्हें 'अदृश्य जादूगर' कहने लगा। ऐसा अद्भुत और अपने लक्ष्य के लिए समर्पित व्यक्ति मैंने दूसरा नहीं देखा। साहित्य और किताबें उनके जीवन का लक्ष्य हैं, एक मिशन... । उनसे मिल कर लगता है जैसे वे कोई तपस्या कर रहे हैं, कोई सुदीर्घ साधना।
मैं भाग्यशाली हूँ कि उन्हें मेरी रचनाएं बहुत पसंद हैं। यह संयोग ही था कि उस दिन मैं गोरखपुर के पास कुशीनगर में था, जब उनका फोन आया था और उन्हों ने जर्मनी के इस निमंत्रण की सूचना दी थी। जब मैंने उन्हें बताया कि मै इस समय ठीक उस स्थल पर हूँ जहाँ बुद्ध का अन्तिम संस्कार हुआ था, तो वे भावुक हो उठे थे। उस रोज़ वहाँ मेरे साथ अत्यन्त सहृदय विद्वान अरुणेश नीरेन और युवा लेखक आशुतोष भी थे। हिन्दी के उद्भट जीनियस वागीश शुक्ल के भाई गणेश शुक्ल भी, जिनसे मैं पहली बार मिल रहा था।
क्या जर्मनी के विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मेले से आने वाला यह अप्रत्याशित निमंत्रण बुद्ध का उपहार था, या मेरे नये उपन्यास के पात्र 'चीना बाबा' का कोई जादू।
या फिर ये सारा करिश्मा किसी और का नहीं, क्रिश्चियन वाइस और जर्मनी के मेरे बहुत सारे दोस्तों का था....?
लेकिन फिलहाल उस दिन, ७ अक्टूबर को फ्रेइबुर्ग में मै यह सोच रहा था कि जब मै पहली बार अपने पोते मारियुस से मिलूंगा तो क्या वह मुझ अपरिचित को देख कर डरेगा और रोने लगेगा...? उससे मिलने के लिए मेरे हृदय में तीव्र आतुरता थी। बाबा बनने का पहला अनुभव पहली बार पिता बनने के अनुभव से शायद बहुत अलग नहीं होता।
लेकिन जब मै उससे मिला, उसने मुझे देखा तो रोया या डरा बिल्कुल नहीं। वह ज़रा सा लजाया। कई बार पीछे मुँह छिपाया और फिर मेरी गोद में आ गया। चुपचाप। जैसे वर्षों से मुझे जानता हो...!
यह कैसे होता है? क्या कोई जैविक स्मृति...जेनेटिक मेमोरी...?
या कुछ और....?
उसकी एक साल से भी कम, नन्ही देह में जो आंच और महक थी, वह इतनी अपनी और आत्मीय थी कि मेरे अतीत के सारे रिसते हुए घाव एक-एक कर भरने लगे। पहले मेरी आँखें भीगीं फिर अपने को संभाल कर मैं हंसा।
जवाब में वह इतना और इस तरह से हंसा, जैसा कोई एक साल का मारियुस ही हंस सकता है।
इस हंसी को मैं सदियों से जानता हूँ....
मेरी बहू मारी ने कहा 'बोलो 'बाबा'.....बोलो..'बा...बा.....' ।'
वह नहीं बोल सका और शर्माने लगा।
